आसमाँ को छूने की ख्वाहिश तो बचपन से थी,
ऊचाइयों से क्यों आज लगता है डर..
समंदर को नापने की तमन्ना की थी,
गहराईयों से क्यों आज लगता है डर..
दुनिया से आगे निकलने का ही तो ख्वाब था,
तनहाइयों से फिर आज, क्यों लगता है डर ?
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