दोस्त, नया कोई राज़ बता.
ज़िन्दगी की अफरा-तफरी में,
खोई हुई दिल की आवाज़ बता.
इन अनकही उलझनों को,
संग पिरोने वाले अलफ़ाज़ बता.
जिस छत की देहली से,
खुले आसमाँ तले,
पर फैलाये आज़ाद परिंदे,
लेते थे परवाज़ बता.
दोस्त, नया कोई राज़ बता.
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1 comment:
bohat sahi :)
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